राजस्थान में ‘नाता विवाह’ की विधिक मान्यता एवं महिला अधिकारों का सुदृढ़ीकरण
एक विस्तृत शोध रिपोर्ट
प्रस्तावना:
राजस्थान के विधिक इतिहास में जनवरी 2026 का महीना एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध हुआ है, जब राजस्थान उच्च न्यायालय ने सामाजिक न्याय की दिशा में एक क्रांतिकारी निर्णय सुनाया। न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने ‘रामप्यारी सुमन बनाम राजस्थान राज्य’ के प्रकरण में यह व्यवस्था दी कि पारंपरिक ‘नाता विवाह’ से विवाहिता महिला पति की मृत्यु के पश्चात पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने की पूर्ण विधिक अधिकारी है।
यह निर्णय न केवल महिला की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक प्रथाओं को आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप ढालने का सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। न्यूज़एक्सेल मीडिया के मुख्य संपादक प्रेम चंद भाटी के अनुसार यह फैसला ग्रामीण महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
नाता विवाह: सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
राजस्थान के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में ‘नाता विवाह’ केवल एक सामाजिक प्रथा नहीं बल्कि पुनर्वास की एक व्यवस्थित परंपरा रही है। यह प्रथा विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए विकसित हुई जो विधवा, परित्यक्ता या पूर्व वैवाहिक संबंध से अलग हो चुकी थीं।
यद्यपि शहरी समाज विवाह को औपचारिक पंजीकरण और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित मानता है, वहीं ग्रामीण भारत में सहवास, सामाजिक स्वीकृति और पारिवारिक दायित्व ही विवाह की वास्तविक पहचान रहे हैं।
नाता विवाह के प्रमुख लक्षण
| पहलू | पारंपरिक स्वरूप | विधिक मान्यता (2026) |
|---|---|---|
| विवाह की प्रकृति | सामाजिक एवं संविदात्मक | हिंदू विवाह अधिनियम, धारा 7 के अंतर्गत मान्य |
| पात्रता | विधवा / परित्यक्ता | वैध पत्नी की मान्यता |
| साक्ष्य | सहवास व सामाजिक स्वीकृति | भरण-पोषण व न्यायिक स्वीकारोक्ति |
| आर्थिक अधिकार | पारिवारिक सहयोग | पारिवारिक पेंशन की पात्रता |
रामप्यारी सुमन प्रकरण: न्यायिक हस्तक्षेप
60 वर्षीय रामप्यारी सुमन ने अपने पति पूरण लाल सैनी (सेवानिवृत्त पटवारी) की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन हेतु आवेदन किया। विभाग ने नाता विवाह के पंजीकरण और नामांकन के अभाव में दावा खारिज कर दिया।
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि पति ने अपने जीवनकाल में महिला को पत्नी स्वीकार किया है और भरण-पोषण दिया है, तो राज्य उसे पत्नी मानने से इनकार नहीं कर सकता।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की व्याख्या
अदालत ने अधिनियम की धारा 7 की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि विवाह समुदाय की प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार भी वैध हो सकता है। नाता विवाह राजस्थान में सामाजिक रूप से स्वीकृत है, अतः इसे अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
पेंशन: अधिकार, अनुकंपा नहीं
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पेंशन कोई खैरात नहीं बल्कि कर्मचारी की सेवा का अर्जित अधिकार है। नामांकन केवल प्रशासनिक सुविधा है, इससे वैध पत्नी का अधिकार समाप्त नहीं हो सकता।
| बिंदु | न्यायालय की व्याख्या |
|---|---|
| पेंशन की प्रकृति | कानूनी अधिकार |
| नामांकन | केवल सुविधा, अधिकार समाप्त नहीं |
| विलंब | पेंशन से इनकार का आधार नहीं |
राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 एवं 2025 संशोधन
2025 के संशोधनों के अंतर्गत संतानों की आय सीमा बढ़ाकर ₹12,500 प्रतिमाह कर दी गई है तथा दिव्यांग संतानों के लिए वैवाहिक स्थिति को बाधक नहीं माना गया है।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि पेंशन भुगतान आदेश (PPO) में जीवित पति/पत्नी का नाम अनिवार्य रूप से अंकित किया जाए।
नाता विवाह बनाम शोषणकारी नाता प्रथा
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय सहमतिपूर्ण नाता विवाह की रक्षा करता है, न कि जबरन विवाह या मानव तस्करी जैसी शोषणकारी प्रथाओं को।
- सहमतिपूर्ण नाता विवाह: वयस्कों की सहमति व दीर्घकालिक सहवास
- शोषणकारी प्रथा: जबरन विवाह, वधू-मूल्य, नाबालिगों का सौदा
महिला अधिकारों पर प्रभाव
- पति की मृत्यु के बाद आर्थिक सुरक्षा
- सामाजिक सम्मान एवं वैध पत्नी का दर्जा
- संतानों के विधिक अधिकारों की सुरक्षा
- पंजीकरण के अभाव में भी न्याय की उपलब्धता
निष्कर्ष
राजस्थान उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में सामाजिक न्याय का एक नया अध्याय है। यह फैसला सिद्ध करता है कि कानून को समाज की वास्तविकताओं के अनुरूप विकसित होना चाहिए।
यह निर्णय भविष्य में संपत्ति अधिकार, अनुकंपा नियुक्ति और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में भी नाता विवाह से जुड़ी महिलाओं के अधिकारों को मजबूती प्रदान करेगा।
— NewsExcel Media | शोध विश्लेषण

